गुजरात के तटीय एशियाई शेर ज्यादातर जंगली शिकार पर निर्भर, नई स्टडी में हुआ खुलासा

गांधीनगर, 18 जुलाई (वेब वार्ता)। गुजरात के तट पर रहने वाले एशियाई शेरों को लेकर एक स्टडी सामने आई है। नई साइंटिफिक स्टडी में पाया गया कि गुजरात के तट पर रहने वाले एशियाई शेर पालतू जानवरों के बजाय मुख्य रूप से जंगली शिकार पर निर्भर रहते हैं। इस स्टडी के बाद से यह पुरानी सोच बदल गई है कि यह प्रजाति मवेशियों की तलाश में गिर के जंगलों से आगे बढ़ी।

पीयर-रिव्यूड इंटरनेशनल जर्नल ‘कंजर्वेशन’ में छपी रिसर्च में पाया गया कि कोस्टल एशियाई शेरों द्वारा खाए जाने वाले बायोमास का लगभग 70 प्रतिशत जंगली शिकार से आता है, जो गिर प्रोटेक्टेड एरिया के बाहर इस प्रजाति के बढ़ते रहने की जगह की पारिस्थितिक व्यवहार्यता को दिखाता है।

यह नतीजा तब सामने आया है जब 2025 में किए गए 16वें लायन पॉपुलेशन एस्टिमेशन के अनुसार, राज्य में एशियाई शेरों की आबादी 891 तक पहुंच गई है।

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‘सौराष्ट्र, गुजरात, भारत के कोस्टल इकोसिस्टम में एशियाई शेरों का डाइटरी पैटर्न’ टाइटल वाली इस स्टडी के लेखक मोहन राम, आराधना साहू, नित्यानंद श्रीवास्तव, कृतज्ञ वदार, रोहित चौधरी और लहर झाला हैं।

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रिसर्चर्स ने मार्च और अप्रैल 2024 के दौरान जूनागढ़, गिर सोमनाथ, अमरेली, भावनगर और पोरबंदर के तटीय जिलों से इकट्ठा किए गए 160 शेरों के मल के सैंपल का एनालिसिस किया।

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जूनागढ़ सर्कल के कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स और स्टडी के लेखकों में से एक मोहन राम ने कहा, “हमारी स्टडी में मार्च और अप्रैल 2024 के दौरान जूनागढ़, गिर सोमनाथ, अमरेली, भावनगर और पोरबंदर के तटीय जिलों से इकट्ठा किए गए 160 शेरों के मल के सैंपल का एनालिसिस किया गया और हमारी स्टडी में पाया गया कि शेरों के खाने में जंगली शिकार का हिस्सा 64 प्रतिशत था, जबकि पालतू जानवरों का हिस्सा 31 प्रतिशत था। इस्तेमाल किए गए बायोमास के मामले में, जंगली शिकार का हिस्सा 70 प्रतिशत था, जबकि जानवरों का हिस्सा 30 प्रतिशत था।”

उन्होंने कहा कि नीलगाय शेरों के मुख्य शिकार के रूप में उभरी है। राम ने कहा, “सभी शिकार प्रजातियों में से, नीलगाय शेरों के भोजन का मुख्य जरिया बन गई, जो खाए गए कुल बायोमास का आधे से ज्यादा (51 प्रतिशत) हिस्सा थी। जंगली सूअर दूसरा सबसे बड़ा जंगली शिकार थे, जबकि मवेशी सबसे बड़ा घरेलू शिकार थे।”

रिसर्चर्स ने कहा कि नतीजे उनकी असली सोच से उलट थे कि इंसानी आबादी वाले तटीय इलाकों में रहने वाले शेर जंगली शिकार की कम मौजूदगी के कारण जानवरों पर ज्यादा निर्भर रहेंगे।

स्टडी का नतीजा यह निकला कि गुजरात के तटीय इलाकों में नीलगाय और जंगली सूअरों की अच्छी आबादी होने के कारण शेर ज्यादातर शिकार कर रहे हैं, जिससे जानवरों पर दबाव कम हो सकता है और इंसान-शेर के बीच टकराव को कम करने में मदद मिल सकती है।

स्टडी के मुताबिक, गुजरात का तटीय इकोसिस्टम अब दक्षिण-पश्चिमी तट, दक्षिण-पूर्वी तट और भावनगर तट पर एशियाई शेरों की तीन जरूरी सैटेलाइट आबादी को सपोर्ट करता है।

इन तटीय जगहों पर कुल मिलाकर 100 से ज्यादा एशियाई शेरों के होने का अंदाजा है, जो गिर के जंगलों से आगे इस प्रजाति के लगातार फैलने को दिखाता है।

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि तटीय शेरों का भोजन काफी खास होता है, जिसमें ज्यादातर नीलगाय और जंगली सूअर होते हैं। इससे पता चलता है कि शिकार की ज्यादा संख्या और रहने की जगह की क्वालिटी उनके खाने के तरीके पर बहुत असर डालती है।

हालांकि शेरों के खाने में मवेशी और भैंस भी शामिल हैं, लेकिन स्टडी में बताया गया है कि खाए जाने वाले ज्यादातर मवेशी जंगली जानवर माने जाते हैं, जो सौराष्ट्र के कुछ हिस्सों में बहुत ज्यादा हैं, क्योंकि जो जानवर काम नहीं करते, उन्हें अक्सर छोड़ दिया जाता है।

उनके मिलने और शिकारियों के खिलाफ व्यवहार की कमी उन्हें सुरक्षित जानवरों की तुलना में आसान शिकार बनाती है।

स्टडी में इस बात पर जोर दिया गया कि सुरक्षित जंगलों के बाहर एशियाई शेरों के लंबे समय तक जिंदा रहने के लिए जंगली शिकार की आबादी को बचाना जरूरी होगा।

वन और पर्यावरण मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने कहा कि नतीजों से पता चलता है कि गिर के जंगलों के बाहर रहने वाले शेर खेती को भी फायदा पहुंचा रहे हैं। उन्होंने कहा, “रिसर्च स्टडी से पता चलता है कि गिर के जंगलों के बाहर शेरों की आबादी नीलगाय और जंगली सूअरों का शिकार करके किसानों को फायदा पहुंचा रही है। ये दोनों ही फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे में इनकी आबादी को कंट्रोल करके शेर फसलों के नुकसान को कम करने में मदद कर रहे हैं।”

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